आजकल अधिकांश किसानों की ये तकलीफ रहती है। कि अब खेती-किसानी में कोई फायदा नहीं रहा। गेहू, चावल से लेकर दलहन जैसी कोई भी खेती कर लो, उसमें फायदे से अधिक नुकसान का खतरा मंडराता रहता है। अधिकांशतः ट्रेडिशनल खेती पर निर्भर परिक्षेत्र के ऐसे किसानों को इस तकलीफ से बचने के लिए खेती-किसानी के तौर-तरीकों को बदला चाहिए। सरकारें भी इसके लिए किसानों को प्रेरित करती हैं, लेकिन ये प्रेरणाएं जमीनी हकीकत का रूप लें, ऐसा परिक्षेत्र में शायद ही कहीं दिखता हो। खैर, अन्नदाताओं की ऐसी तकलीफों के बीच परिक्षेत्र में एक किसान ऐसा भी है, जिसने ट्रेडिशनल खेती को कॉमर्शियल में तब्दील करने का एक प्रकार से संकल्प ही ले लिया है और इसके लिए उसने अपने प्रयास को धरातल पर उताकर कमाई भी शुरू कर दी है। ये किसान हैं चितरंगी के ग्राम करैला निवासी प्रदुमन प्रसाद वैश्य। जो कि गांव में अपनी जमीन पर मेडिसनल पौधों लेमनग्रास और खस की खेती कर रहे हैं। साथ ही इन मेडिसनल प्लांट से वह सुगंधित तेल भी निकाल रहे हैं और इसके लिए बाकायदा प्लांट भी स्थापित किया है। अहम बात ये है कि ये सबकुछ करने के पूर्व प्रदुमन वैश्व ने 28 वर्ष सरकारी नौकरी की और फिर नौकरी से वीआरएस लेने के बाद ये सबकुछ शुरू किया है, जो कि परिक्षेत्र में खेती-किसानी के क्षेत्र एक अलग प्रकार का प्रेरणादायक नवाचार है।
ऐसे लिया कॉमर्शियल खेती का फैसला
प्रदुमन ने 1987 में बिजली बोर्ड में जेई की नौकरी शुरू की थी। करीब 20 वर्ष नौकरी करने के बाद उनकी पोस्टिंग विभाजित छत्तीसगढ़ में हो गई। वहां 8 वर्ष नौकरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 2016 में वीआरएस ले लिया। नौकरी के दौरान कई जगहों पर रहे और हर जगह ही खेती-किसानी देखकर खुद ये करने की सोचने थे। गांव लौटे तो करीब 6 वर्ष तक ट्रेडिशनल तरीके से खेती की, लेकिन उसमें फायदा मिलना बेहद मुश्किल ही रहा था, इसलिए काफी सोचने व रिसर्च के बाद उन्होंने तय किया कि ट्रेडिशनल खेती के बजाए कॉमर्शियल खेती करेंगे, जिससे वह खेती से जुड़े रहेंगे और आमदनी भी बेहतर होगी।

ऐसे की शुरुआत
प्रदुमन वैश्य ने फरवरी 2024 में कॉमर्शियल खेती की शुरुआत बैंक से पर्सनल लोन लेकर की। इसमें करीब 12 लाख की लागत से 1 टन क्षमता का आसवन प्लांट स्थापित किया, जिससे मेडिसनल पौधों से ऑयल निकाला जाता है। एक एकड़ में खास और आधा एकड़ में लेमनग्रास की खेती की। वह बताते हैं कि लेमनग्रास 5 और खस 1 वर्षीय पौधा होता है। ऐसे में बुआई के बाद लेमनग्रास की पतियों और दस की जड़ से पनांट में प्रोसेस करके सुगंधित आयल निकालना शुरू कर दिया। इन दोनों की बुआई को एक साल हो चुका है। अगर पहले वर्ष की खोती देखेंगे तो बुआई में बैज से लेकर सलभर दोनें की खेती का खरपतवार आदि का खर्च मिलाकर करीब 80 हजार लागत लगी थी।

खस व लेमनग्रास की होती व ऑयल बनाने से जुड़ी अहम बातें
खस व लेमनग्रास के पौधों को खेत में लाइन से लाइन दो फीट, पौधे से पौधे 1 फीट की दूरी पर रखना पड़ता है। एक एकड़ के खेत में लेमनग्रास की बुआई से प्रथम वर्ष 50 किया, दूसरे वर्ष 75 किया, तीसरे से 5वें वर्ष तक करीब 100 किया तक पत्तियों का प्रोडक्शन होता है। पत्तियों को वायलर में डालने पर आप पहुंचता है सेग्रेटर में, जहां तेल व पानी कर अलग होते हैं। फिर पानी पुनः टिसाइकिल होता है। ये प्रक्रिया 8 घंटे चलती है। एक एकड़ में खस की बुआई करने पर साल में एक बार ही उसकी जड़ को निकाला जा सकता है। इसकी जड़े निकालने के लिए जेसीबी से भी खुदाई करानी पड़ती है। फिर लेमनग्रास की भांति इसमें भी जड़ के उस विशेष पार्ट को वायलर में डालते हैं, जो सेपेटर में पहुंचकर आगे प्रोसेस होते हुये ऑयल को अलग करता है और इस प्रक्रिया में करीब 80 घंटे का समय लगता है।
सिंगरौली के जंगलों में पत्थर को तराश कर बनाया गया है रहस्यमई गुफाएँ,फैमिली संग करें एक्सप्लोर